Gender Differences--- Hindi

यह ब्लॉग सीरीज़ स्त्री-पुरूष की मानसिकता, उनकी अपनी बात कहने की अलग शैली, उनकी प्राकृतिक क्षमताएं-अक्षमताएं, न्यूरल अन्तर के विषय में कुछ कहने की प्रयास है. अगर आप तथ्यों से सहमत नहीं हैं, या आपके पास कुछ और सुझाव हैं तो कृपया अपने विचार प्रतिक्रियाओं के रूप में सामने रखें. email: gen.dif.hindi@gmail.com

Thursday, July 17, 2008

GENDER DIFFERENCES ARE REAL ------------- फ्रेंक यार्क

नारीवाद के साथ चलने वाले और भी कुछ आन्दोलन
 मिथ्या धारणाएं और वैज्ञानिक तथ्य
ममता या आक्रामकता: हारमोन का खेल
जैविक अन्तर
मष्तिष्क 
अलग मष्तिष्क : अलग क्षमतायें
शारीरिक शक्ति और स्टेमिना 
सच्चाई सामने है




क्या महिला और पुरूष अलग होते हैं? हाँ, शारीरिक संरचना ज़रूर अलग होती है, पर क्या उनमें और भी कुछ अलग होता है? क्या उनके हारमोनों की भिन्नता का असर उनके व्यवहार और प्रवृत्तियों पर भी पड़ता है? क्या वे एक ही जानकारी को वे अलग अलग तरीके से समझते हैं?

नारीवादी और समलैंगिक (गे) आलोचक अक्सर इन सवालों का जवाब 'ना' में देते हैं. उनका तर्क यह होता है की, जो भी अन्तर देखने में आता है वह ज्यादातर पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था का परिणाम है, और पितृसत्ता के दमन के कारण स्त्रियों को घर गृहस्थी के कामों तक सीमित कर दिया गया. जैविक और प्राकृतिक संरचना क्षमता और भूमिका(लिंग आधारित) का निर्धारण नहीं करती.

                         नारीवाद के साथ चलने वाले और भी कुछ आन्दोलन

कुछ नारीवादीयों का मानना है की "भिन्न लिंग" (यानि स्त्री और पुरूष) का विचार एक भ्रम या मिथ्या धारणा से अधिक कुछ भी नहीं है. डॉ. एन फाउस्तो-स्टर्लिंग, अपनी पुस्तक "The Five Sexes: Why Male and Female Are Not Enough", में लिखती हैं की, हमारी सभ्यता ने "लिंग आधारित द्विदलीय प्रणाली" लागू करके सीधे प्रकृती का ही उपहास उड़ाया है. क्योंकि, "जैविक दृष्टी से अगर देखें तो मादा से नर के ब्लेक एंड व्हाइट के बीच कई धूसर पड़ाव भी हैं, और जिस प्रकार से हम देख पाते है, उसके आधार पर कहा जा सकता है की हमारे आस पास नर या मादा ही नहीं बल्कि कम से कम पाँच तरह की लैंगिकताओं वाले लोग मौजूद हैं, या शायद और भी ज़्यादा".

नर-मादा प्रणाली को सिरे से नकार कर भी कुछ लोग संतुष्ट नहीं हैं, समलैंगिक अधिकारों की वकालत करने वाले एक धड़े के एक उप-वर्ग ---ट्रांस जेन्डर्स--- ने पश्चिमी देशों में क्रॉस-ड्रेसिंग (विपरीत लिंग की पोशाकें पहनना) और ट्रांस-सेक्सुअल (लिंग परिवर्तन) जैसी बातों को सामान्य रूप से लिए जाने की मांग शुरू कर दी है. और कुछ तो इस हद तक भी चले गए हैं की वे शी-मेल बनकर जीवन बिता रहे हें. - (शी-मेल-------> स्त्री और पुरूष दोनों के शरीरिक लक्षणों वाला व्यक्ती ).

                            मिथ्या धारणाएं और वैज्ञानिक तथ्य

प्रोफेसर स्टीवन गोल्डबर्ग (समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष, सिटी कॉलेज ऑफ़ न्यूयार्क), ने अपनी भड़काऊ शीर्षक वाली पुस्तक, "Why Men Rule--A Theory of Male Dominance" में उन कई धारणाओं को खारिज किया है जिनके सहारे नारीवादी अपनी बात रखते हैं और जिन्हें स्त्री-पुरूष के बीच अंतरों का कारण बताया जाता है.

गोल्डबर्ग के अनुसार यह सच है की स्त्री और पुरूष जेनेटिक व हारमोन के स्तर पर ही मानसिकता और व्यवहार में काफी अलग होते हैं, पर इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं निकला जाना चाहिए की पुरूष या स्त्री में कोई किसी से ऊंचा है या हीन है.
अपनी अपनी क्षमताएं और कमजोरियां हैं, जो की प्रकृती की देन हैं. पर, उनकी मानें तो न्यूरो-एंडोक्राइन सिस्टम का पर हुए शोध इस बात का साफ सुबूत हैं की, टेस्टास्टोरोन हारमोन का उच्च स्तर  पुरुषों को आक्रामक बनता है और उन्हें अपने माहौल, लोगों व्यवस्था को काबू में कर लेने के लिए प्रेरित करता है. वहीं महिलाओं में इस हारमोन का निम्न स्तर उन्हें समाज में कम आक्रामक, तटस्थ और ममत्व भरी घरेलू भूमिका के लिए प्रेरित करता है.

वे आगे लिखते हैं,

ऐसा कोई भी समाज या सभ्यता नहीं  है और न कभी रहा है, जिसने परिवार या समूह के मुखिया के पद या नेतृत्व को कहीं न कहीं पुरूष से सम्बद्ध न किया हो. और इसका कोई अपवाद इतिहास में भी नहीं मिलता."

नारीवादी आलोचकों का मानना है की समाज के तौर तरीके, रीति रिवाज ऐसे प्रमुख कारण हैं की जिनके कारण पुरुषों के हाथों में सारी सभ्यताओं और संस्कृतियों की बागडोर चली गई, पर गोल्डबर्ग इसका प्रतिवाद करते हैं:

".....अगर सामाजिक तौर तरीकों और रीति रिवाजों की थ्योरी ही इस बात को पूरी तरह समझा पातीं की क्यों समाज पितृसत्तात्मक है, तो ऐसीं कुछ संस्कृतियाँ और समाज भी होते जिनमें नेतृत्व और प्रभुत्व को स्त्रीयों से जोड़ कर देखा जाता, ऐसी कोई मिसाल नहीं है, अगर आप कुछ दंतकथाओं और साहित्य में पाए जाने वाले पूरी तरह गैर-पितृसत्तात्मक व्यवस्था वाले समाजों का ज़िक्र न करें तो."

                            जैविक अन्तर
 
यह कहना की नर और नारी 'एक जैसे' हैं, सीधे सच को नकारना ही है. बाल मनोवैज्ञानिक डॉ. जेम्स डोबसन अपनी बेस्ट-सेलर पुस्तक "Straight Talk to Men and Their Wives" में एक बड़ी मज़ेदार घटना का को याद करते हैं. कई सालों पहले एक दवा कंपनी ने एक प्रयोग के तहत, दक्षिण अमेरिका के मछुआरों के एक गाँव को तजुर्बे के लिए चुना. वहां की सभी युवा महिलाओं को कुछ महीनों तक एक साथ गर्भनिरोधक गोली का सेवन कराया गया. तीन सप्ताह बाद दवा बंद कर दी जाती जिससे की मासिक धर्म (menstruation) में बाधा न आए.

"इसका सीधा अर्थ था की," वह आगे बताते हैं, "उस गाँव की सभी व्यस्क महिलाएं एक साथ मासिक पूर्व तनाव (premenstrual tension) अनुभव कर रहीं थीं. और वहां के पुरूष इस बात से हैरान-परेशान, एक साथ सभी अपनी नावें उठा कर समुद्र का रुख कर लेते थे, और तब तक वहीं रहते थे, जब तक की घर में संकट का समय बीत नहीं जाता था. भले ही कुछ लोग इस बात से अनजान हों, पर वह मछुआरे जानते थे, की औरतें मर्दों से अलग होतीं हैं......... विशेषकर हर २८ दिनों में."


विज्ञान और टेक्नोलोजी ने अब यह साफ़ कर दिया है की नर और नारी गर्भाधान के क्षण से ही अलग होते हैं. एमरम शेंफील्ड का " Your Heredity and Environment", में कहना है की, महिला और पुरूष का यह अन्तर क्रोमोसोम के स्तर पर ही दिखने लगता है, जिनके द्वारा माता पिता के गुण संतान में आते हैं. मानवों की हर कोशिका में क्रोमोसोम के २३ जोड़े होते हैं, उनमें से २२ लड़के और लड़की में सामान रूप से पाए जाते हैं. पर, शेंफील्ड का कहना है, "....जब हम २३वे जोड़े पर नज़र डालते हैं, तो पाते हैं की कुछ बातें एक सी नहीं हैं ... हर औरत के पास उसकी हर एक कोशिका में दो एक्स क्रोमोसोम होते हैं. पर पुरूष के पास यह एक्स क्रोमोसोम सिर्फ़ ही होता है --- काफी छोटा वाई क्रोमोसोम उसके साथ जोड़े में होता है."

यह प्रभुत्वशाली वाई क्रोमोसोम की उपस्थिति ही है, शेंफील्ड के अनुसार, "जो लैंगिक विकास की सारी मशीनरी का सञ्चालन करती है और जिसके कारण सारे अन्तर मूल रूप से जेनेटिक स्तर पर ही देखने मिल जाते हैं."
तो भिन्नताएँ सीधे कोशिका के स्तर पर हैं.

लिंग आधारित अंतरों की शुरुआत भ्रूण के विकास के साथ ही शुरू हो जाती है. सेक्स हारमोन - मुख्य रूप से इस्ट्रोजन और टेस्टास्टोरोन --- पुरूष और नारी के स्वाभाव में इनका काफ़ी अधिक प्रभाव पड़ता है. लड़के क्यों कार और बंदूकों वाले खिलौने पसंद करते हैं पर क्यों लड़कियां गुड्डे-गुड़िया, डॉल और टेडी जैंसे खिलौने पसंद करतीं हैं? आमतौर पर फेमिनिस्ट्स क दावा होता है की यह सामाजिक कारणों से होता है, पर अब हमारे पास यह कहने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण हैं की लड़कियां और लड़के अपने अपने हारमोन स्तर से प्रभावित होते हैं.

                      ममता या आक्रामकता: हारमोन का खेल

 'ए बी सी चैनल' के एक विशेष कार्यक्रम, "Boys and Girls are Different", में टीवी होस्ट जॉन स्टोशेल ने कई विश्वविद्यालयों द्वारा नारी और पुरूष के बीच जन्मजात अंतरों को पहचानने के किए गए कई अध्ययनों के बारे में जानकारी दी. इन अध्ययनों के अनुसार:

विस्कोंसिन विश्वविद्यालय में,  वहां के  वैज्ञानिकोंद्वारा  मादा बंदरों के भ्रूण को टेस्टस्टोरोन के टीके  लगाए गए  . स्टोशेल के अनुसार, बंदरों का स्वाभाव और व्यव्हार लिंग के अनुसार बहुत अलग-अलग होता है, नर बन्दर स्वाभाव से आक्रामक और लडाकू होते हैं, और लगभग हमेशा ही मादा बंदरों को समूह के बच्चों की देखभाल करते और उनके बाल संवारते देखा जाता है. पर उन मादा बंदरों ने, जिन्हें टेस्टस्टोरोन का टीका जन्म से पहले दिया गया था, अपने बच्चों की देखभाल या उनके बालों को संवारने में कभी कोई रूचि नहीं दिखाई. वह भी नर बंदरों की ही तरह व्यव्हार कर रहीं थीं और स्वाभाव में काफी लड़ाकू और आक्रामक थीं.


मानवों में लगभग हर एक लाख भ्रूणों में से किसी एक मादा भ्रूण को  जेनेटिक त्रुटी के चलते गर्भ में ज़रूरत से काफ़ी अधिक एंड्रोजन (एक पुरूष हारमोन) मिल जाता है. ऐसी लड़कियों को 'सी ऐ एच गर्ल्स' का नाम दिया गया है. (सी ऐ एच-------->  congenital adrenal hyperplasia). ऐसी लड़कियां जन्म तो लड़की के रूप में  लेतीं हैं, पर उनका व्यावहार और बर्ताव 'टॉम बॉय' जैसा होता है. पुरूष हारमोन एंड्रोजन उनकी इच्छाओं और स्वाभाव को गहरे तक प्रभावित करता है. ऐसी लड़कियों को बाकी लड़कियों के मुकाबले 'लड़कों के खिलौनों' में ज़्यादा रूचि होती है.


बाल मनोवैज्ञानिक माइकल लेविस ने एक प्रयोग के तहत, एक साल के कुछ बच्चों (लड़के और लड़कियां दोनों) को उनकी माँ से एक कमज़ोर सी दीवार द्वारा अलग कर दिया गया. लड़के दीवार गिराने की कोशिश करते रहे वहीं लड़कियां बिना कुछ किए वहीं खड़ी रोतीं रहीं.



                     मष्तिष्क

 स्त्री और पुरूष केवल उनके स्वाभाव का संचालन करने वाले हारमोनों में ही नाटकीय रूप से अलग नहीं होते, बल्कि सोच-विचार में भी उनमें काफी फर्क होता है. स्त्रीयों और पुरुषों की दिमागी संरचना अलग होती है.



जॉर्ज मेसन विश्वविद्यालय के रॉबर्ट नादे जो की "S/he Brain: Science, Sexual Politics, and the Feminist Movement", के लेखक हैं, बताते हैं की पुरुषों की दिमागी संरचना स्त्रीयों से काफ़ी अलग होती है. वे इसी विषय पर अपने एक लेख "The World & I" , (नवम्बर 1, 1997), में लिखते हैं,
   
"जैंसे की शरीर अलग हैं, उसी तरह नर मष्तिष्क और मादा मष्तिष्क में भी अन्तर है, और ये अन्तर ही ऐसे सामाजिक बर्ताव या तौर-तरीकों का कारण हैं जिन्हें हम स्त्री या पुरूष के साथ जोड़ कर देखते हैं."

नादे के अनुसार लिंग आधारित यह अन्तर प्राचीन-मष्तिष्क ( primitive brain ---------> मूल प्रवृत्तियों के लिए जिम्मेदार, जो मानव के साथ हर प्राणी में पायीं जातीं हैं) और नियोकोर्टेक्स---- उन्नत मष्तिष्क (मानवों में पाया जाने वाला) दोनों ही क्षेत्रों में पाया जाता है.


नियो कोर्टेक्स में केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के 70 प्रतिशत न्यूरोन होते हैं, और यह अखरोट की तरह दो भागों में विभाजित रहता है, इन दोनों को कोर्पस कोलोसम नाम का बीस करोड़ तंत्रिकाओं का नेटवर्क जोड़ता है.


मष्तिष्क का दांया भाग भाषा को समझने, अभिव्यक्ती, अंगों के हिलाने डुलाने का काम करता है, जबकि बांया भाग गणितीय व ज्योमेट्रिक क्षमता, चेहरे के भाव, भावनाओं, और आवाज़ में उतार-चढाव के लिए जिम्मेदार होता है.



महिलाएं पुरुषों से अलग ढंग से सोचतीं हैं क्योंकि उनके मष्तिष्क में स्प्लेनियम नाम का हिस्सा काफ़ी बड़ा होता है और वह सक्रीय भी अधिक रहता है. अध्ययन बताते हैं की, समस्याएं सुलझाने में महिलाएं दिमाग के दोनों हिस्सों का उपयोग करतीं हैं, पर पुरूष का दिमाग एक ही भाग का उपयोग कर पाता है.

आगे नादे लिखते हैं की, स्त्री और पुरुषों के संवाद स्थापित करने की अलग शैली उनके मष्तिष्क के लिंग आधारित अंतरों के कारण हैं. अक्सर देखने में आता है की महिलाओं के पास 'भावनात्मक छठी इन्द्री' होती है, जो "दूसरे की भावनाएं बिना कहे सुने बारीकी से पहचान लेने, चेहरे के बारीक भाव पढ़कर, या आवाज़ में छोटे बदलावों को पकड़ लेने और कही गई बातों का छिपा हुआ अर्थ निकाल लेने जैसी बातों में महिलाओं को पुरुषों से कई गुना ज़्यादा सक्षम बना देती है." इसी प्रकार, नवजात शिशु अगर लड़का है तो वह वस्तुओं को देखने में अधिक रूचि दिखता है, वहीं नवजात लड़कियां चेहरों और बातचीत पर लड़कों से  ज़्यादा प्रतिक्रिया देतीं हैं.

                    अलग मष्तिष्क : अलग क्षमतायें

स्त्रीयों और पुरुषों के मष्तिष्क के अन्तर किसी एक लिंग को ऊँचा या हीन साबित नहीं करते, पर यह ज़रूर बताते हैं की उनकी क्षमतायें कहाँ हैं.  Feminism and Freedom पुस्तक के लेखक, माइकल लेविन, बताते हैं की, आमतौर पर, बनिस्बत महिलाओं के, पुरुषों में जटिल त्रिआयामी और गणितीय क्षमता ज़्यादा होती है . नारीवादियों का तर्क अक्सर यही होता है की यह अन्तर केवल सामाजिक आशाओं के कारण होता है ----- अगर लड़कियों को भी गणितज्ञ बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाए तो, उनकी क्षमतायें और प्रदर्शन लड़कों जैंसा ही होगा----- पर आज तंत्रिका विज्ञान के पास इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं की यह अन्तर जन्मजात होते हैं और बचपन से ही दिखाई देने लगते हैं; और जैसे जैसे बच्चे व्यस्क होने लगते हैं, यह अन्तर और भी साफ होते जाते हैं. लड़कों के विपरीत, लड़कियां बातचीत में ज़्यादा कुशल होतीं हैं, वे पुरुषों से अधिक साफ सुन सकतीं हैं और पढ़ना एवं शब्दावली(VOCABULARY) लड़कों से जल्दी सीखतीं हैं साथ ही भाषा में उनका प्रदर्शन लड़कों से अच्छा होता है.

पुरुषों में किसी भी वस्तु, स्थान या आकार की त्रि-आयामी कल्पना कर सकने की मानसिक  क्षमता बहुत अधिक होती है. और यही बात पुरुषों के लिए गणित और ज्योमेट्री जैसे त्रि-आयामी विषय काफी सुगम बना देती है;  और यही पुरुषों के लिए हाथ, पैरों व शरीर के जटिल संचालन की अतिरिक्त क्षमता देती है. (जैसे की विशालकाय जटिल मशीनें संचालित करना, फुटबॉल, क्रिकेट, गोल्फ जैसे खेलों में जटिल मूवों (MOVES) का प्रदर्शन, बचाव कार्य जैसे काम).

                    शारीरिक शक्ति और स्टेमिना

महिलाओं और पुरुषों की मष्तिष्क ही संरचना के मामले में ही अलग नहीं होते, शरीर की शक्ति और स्टेमिना (अधिक समय तक भारी श्रम सहन करने की क्षमता) में भी वे अलग होते हैं. यह अन्तर जेनेटिक भी होता है और दोनों का अलग हारमोन सिस्टम भी इसका कारण होता हैं. माइकल लेविन लिखते हैं महिला शरीर में कमर से ऊपर की मांसपेशियों में पुरुषों की तुलना में औसतन केवल 55-58 प्रतिशत ही ताकत होती है, अपने ही वजन के के पुरूष की तुलना में वे 20 प्रतिशत कम ज़ोर लगा पातीं हैं. यह अन्तर तीन साल की उम्र से ही दिखना शुरू हो जाते हैं, जब देखने में आता है की बच्चे, बच्चियों की तुलना में अधिक सटीक और ज़्यादा दूर तक निशाना लगाने में सक्षम होते हैं. 

नारीवाद की वकालत करने वाले बड़ी ही सहजता से कहते पाए जाते हैं की पुलिस, अग्निशामक व बचाव कर्मी या पैदल सैनिक की नियुक्तियों के लिए चुनाव करते समय स्त्रीयों और पुरुषों के शारीरिक अन्तर पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए. पर इस पर लेविन का तर्क है की, साफतौर पर महिला शरीर में इतनी ताकत और सहनशक्ति नहीं होती की वे युद्ध की स्थिति में पैदल सैनिक की जिम्मेदारियों को सही ढंग दे पूरा कर सकें. पर फ़िर भी पोलिटिकली करेक्ट होने के लिए या नारीवादियों के दबाव में आकर सेना ने ऐसी महिलाओं की नियुक्ति शुरू कर दी है जो पैदल सेना का हिस्सा बनाना चाहतीं हैं. अब सेना ने उनके लिए उनके लिए मानक (स्टेंडर्ड) ढीले रखे हैं और ड्रिल-कसरतों को भी काफी सरल रखा है जिससे की वह पुरुषों के बराबर पदों तक आसानी से जा सकें. पर मैदान में दुश्मन महिला सैनिक से लड़ने अपनी किसी महिला सैनिक को नहीं भेजेगा.

                    सच सामने है

नारीवादियों की, बाई-सेक्सुअल्स, ट्रांस-सेक्सुअल्स की जो भी इच्छाएं, कल्पनाएँ या महत्वकान्क्षाएं हों, पर सच यही है की महिला और पुरूष --- और उनके बीच अन्तर, यह सभी कुछ हमारे डी.एन.ए में पहले से प्रोग्राम रहता है, गर्भाधान के पहले ही पल से. महिला और पुरूष की दिमागी संरचना में अन्तर साफ है, और टेस्टास्टोरोन और इस्ट्रोजन शरीर में दौड़ता वह रस है जो पुरूष को पुरुषत्व, और स्त्री को स्त्रीत्व देता है.

और यह बात भी उतनी ही सच है, की माता-पिता से मिली लिंग आधारित असमान्यताएं कुछ एक लोगों में असर दिखतीं हैं, और संभावना बढ़ा देतीं हैं की पीड़ित बच्चा आगे चलकर ट्रांस-जेंडर या ट्रांस-सेक्सुअल बन जाए (कुछ मामलों में, समलैंगिक भी).

पर अगर प्रकृति की  इन (दुर्भाग्यशाली) गलतियों को नज़रंदाज़ कर दें--------- प्रकृति की त्रुटी के ऐसे मामले अपवाद ही हैं और सामान्य रूप में नहीं लिए जाने चाहिए---------- तो भी या सीधा सा सच सामने है:   पुरूष होना और स्त्री होना यानि मानव संरचना का अलग पुर्जा होना है, अदला बदली कम से कम मानव द्वारा तो मुश्किल है.

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आप इस लिंक पर जाकर फ्रेंक यार्क के मूल आलेख को अंग्रेज़ी में पढ़ सकते हैं.

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